हमारे यहाँ क्या, कल्पना से भरी एक मातृभूमि की तस्वीर बनाना... यह बंगाल वालों की बात है। राजस्थान में तो हमने सदियों से ऐसे रंग बनाए हैं, खनिज और पौधों से, जो पानी में घुलकर अपनी कहानी कहते हैं। तेल के रंगों से इनकार? क्यों करेंगे? हमारे यहाँ तो भित्ति चित्र हमेशा जल रंग और प्राकृतिक गोंद के साथ बने हैं, क्योंकि ये हमारी धूप और हवा में टिकते हैं। मेरे पिताजी की हवेली की दीवारों पर लगे फ्रेस्को देखो, सौ साल बीते, पर रंग वैसे के वैसे हैं।
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