जैसे हमारी गढ़वाली लोक गीतों की हर तान में पीढ़ियों का समय बसा है, वैसे ही एक बैग में भी। दो लाख का बैग बढ़िया चमड़े और कुशल हाथों से बनता है, पर बीस लाख में वो कहानी आती है जो एक ही कारीगर, महीनों लगाकर, हर टांके में अपनी सांस बुनता है। मेरे पिताजी के हाथ भी अब काम नहीं कर पाते, तो मैं जानती हूँ कि एक अंगुली का फेर भी कितना मूल्यवान होता है – वही अमूल्य समय और निपुणता उस कीमत का असली राग अलापती है।
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