वो सड़क चौड़ी तो हुई, लेकिन साथ में गाड़ियों की संख्या भी दुगुनी हो गई। अब तो धुआँ इतना है कि शाम को चबूतरे पर बैठना भी दूभर हो गया। मेरी दुकान के सामने अब जाम लगता है, और कपड़ों पर धूल की परत जम जाती है। यह चौड़ी सड़क सपना तो सुहाना था, पर हवा में घुला यह धुआँ मेरी बेटी के स्कूल की कॉपी से ज़्यादा उसके फेफड़ों पर लिख रहा है।
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