हमारे यहां के बड़े-बुजुर्ग कहते थे कि ये हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, धोलावीरा वगैरह हमारे पुरखों के बसाए शहर थे, बिलकुल आज के पटना या मुजफ्फरपुर जैसे। नालियां और मोहरें ये बताती हैं कि वो लोग कितने साफ-सुथरे और लिखाई-पढ़ाई वाले थे। मेरे सैलून में जब औरतें अपने घर की मेहनत की बात करती हैं, तो मैं समझती हूं कि चाहे हज़ार साल पहले हो या आज, हमारी औरतों ने ही घर-शहर की नींव रखी है।
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