यह सिद्धांत में कहता है कि एक बंदी सहयोग करके छूट सकता है, पर धारा ३०६ का 'अप्रूवर' बनना हमारे पहाड़ी इलाके में तो स्थाई कलंक है। मेरे भाई ने सरकारी गवाह बनकर छोटी सज़ा पाई, पर आज तक गाँव वाले उसके दरवाजे पर फूल नहीं चढ़ाते। कागज़ पर माफी और ज़िन्दगी में माफी अलग बातें हैं।
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