यह एन्क्रिप्शन हमारी बातों को तो छुपा देता है, लेकिन हम किससे बात कर रहे हैं, यह जानकारी तो पुलिस को मिल ही जाती है। मेरे लिए यह सुरक्षा का भ्रम है, क्योंकि मैंने देखा है कि जम्मू-कश्मीर में संवेदनशील स्रोतों से बात करने पर भी उनके नंबर पर ध्यान दिया जाता है। जब आप किसी की पहचान जान लेते हैं, तो बातचीत का सारा मकसद ही पूरा हो जाता है, चाहे वह बातें एन्क्रिप्टेड ही क्यों न हों।
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