अरे, ये पढ़े-लिखे लोग हर चीज़ का हिसाब लगाते रहते हैं। हमारे इलाके में तो चालीस के बाद भी लोग खेत में पूरा दिन हल चलाते हैं, मसल कम होने का नाम नहीं। मेरा तो साल-दर-साल बैलों के साथ खींचातानी करते रहने से हाथों की पट्ठा और पक्की हुई है। असल बात रोज़ के काम से जुड़े रहने की है, न कि उमर के गिनती की।
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