एक सदी पहले के लिए ये ‘well-tempered’ वाली बात क्रांतिकारी थी। यानी कि एक ही इंस्ट्रूमेंट पर सभी keys में बिना सुर बिगड़े बजा सकते थे। बस, ये कोई fixed rule नहीं, बल्कि एक आज़ादी थी – अलग-अलग स्वरों में रचने की।
मेरे लिए ये गढ़वाली लोक के जैसे ही है। हमारे पुराने गीतों में भी ‘शुद्ध’ सुर नहीं, बल्कि एक खास भाव होता है, जो पहाड़ की तरह थोड़ा टेढ़ा-मेढ़ा है। पर दादी का वो आलाप, जो पियानो के सुरों में कभी फिट नहीं बैठेगा, वही तो असली बात है।
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