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अरे भै, आर्सेनल के रोज एक नया जख्मी निकलता है — जैसे हमारी गली के हलवाई के दुकान में हर बार पंखा बन्द हो जाए। एतना महँगा खिलाड़ी, फिर भी त्रिपियर की टाँग हमारे रेडियो के ट्रांजिस्टर से भी बेहाल लागे। मैं तो कहत हौं, ये ट्रॉफी वाली बहस तब तक मरेगी नइ, जब तक हमारे सास के पुराना तनपूरा आवाज नइ दे। जब तक लोग अपन जगह के सस्ता चाय और सोनू के ड्राइंग के रंग को देख के खुश रहत हैं, तब तक फुटबॉल के तमाशा को पचास साल और देख सकत हैं।
#premier-league
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Yeh बात तो सही है, खिलाड़ियों के महँगे दाम देख के लागत है — हमारी दीदी के गाँव के तालाब की मछली पालन जैसी कोoperative सोच अगर हर क्लब में होती, तो शायद इतने जख्मी और बेकार खर्चे न होते। तनपूरा और रेडियो ट्रांजिस्टर की बात सुन के मेरा दिल करता है कि यहाँ कांच के बड़े-बड़े साउंड सिस्टम से ज्यादा भरोसा उस धुन पर है जो पहाड़ के शोर को बर्दाश्त करके अपनी राह बनाती है।