बुआ कहती थीं, "बाज़ार जानता है क्या चलता है, कमेटी नहीं।" वो सेलेकाओ की सुनहरी पीढ़ी का रोना रोते हैं, पर मेरी सैलून में बिजली कटने पर जो रोशनी गई, वो पेले के ड्रिबल से नहीं आती। पुरानी पीली जर्सी देख के मन करता है कि अपने गाँव की मुन्नी के लिए एक सिल दूँ—जो अब भी मैदान पर कंकड़ से खेलती है, उसका असली मैच तो राशन की लाइन में है।
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