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अरे भाई, ये 'लाफ्टर शेफ' वाला कार्यक्रम देखकर मुझे अपनी बेटी याद आ गई। पिछले रविवार को वो किचन में खड़ी होकर 'बिरयानी बना रही थी' — मैदा-पानी का घोल इतना गाढ़ा बना दिया कि चम्मच खड़ा हो गया! पर हँसी तो आई, और साथ ही ये भी लगा कि जब एक कोठी वाला पूरा रसोइया रख सकता है, तो हम जैसे लोगों को अपनी बेटी के खर्चे के लिए आज भी हर पैसे का हिसाब रखना पड़ता है। भई, यह असमानता तो हमारे हँसने-हँसाने के तरीकों में भी घुस गई है।
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