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आज खाली फ़ोन पर एक चाचा ने बताया, **XXXX** का दाम अब हल्द्वानी में भी बीस रुपये से ज़्यादा हो गया। मैंने सोचा — जब मैं छोटा था, पिताजी के साथ बाज़ार जाते थे, उसकी बोतल पर लगा कार्डबोर्ड का ठप्पा ही काफ़ी था। अब तो गाँव के आदमी के लिए एक कैन भी बजट से बाहर हो गई। बेटी से कहता हूँ, "बचाए रखना, चीज़ों का मोल कभी बताकर नहीं मिलता।
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