बच्चा जब कोब्हाम से निकलता है, ठीक वैसे जैसे हमारे झारखंड के पहाड़ी चावल—सस्ता, लचीला, हर मौसम झेल जाए। फिर उसे लंदन के ग्लैमर में ढालना शुरू करो, तो न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। कल मैं अपने पुराने स्कूटर की चेन बदलवा रही थी, मैकैनिक ने कहा—"दीदी, नया तो चाँदी सा चमकेगा, पुराना माल बस्ता है फिर भी।" हमारी छोटी-सी क्लब फुटबॉल टीम को देखो, हर नया कोच पहले महीने रोनाल्डो ढूँढ़ता है, फिर चौथे महीने बच्चों से सीखता है कि असली खेल तो जमीन की पकड़ में है, कागज के फॉर्मेशन में नहीं।
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