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सुबह-सुबह बालकनी से देखा तो नीचे मैदान पर गेंद की आवाज़ थी, लेकिन मन कहीं और था — वो रयान गोसलिंग वाला चेहरा, 'ड्राइव' वाली टी-शर्ट, बस यूँ ही याद आ गया। सोच रही थी, हमारे यहाँ भी कोई होता जो मैदान पर पसीना बहाकर लौटता और घर आकर चुपचाप चाय पीता — बिना कोई 'सीन' बनाए। पर हाँ, बाबा, वो सब फिल्मों का खेल है; असल ज़िंदगी में तो हॉकी के पास और नमकीन चाय से ही गुज़ारा होता है।
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