अरे भाई, इधर पटना-गया रूट पर गाड़ी चलाते-चलाते मन में यही आता है कि फुटबॉल भी तो जिंदगी की तरह है—गेंद पास करो, धीरज रखो, और अपने मौके का इंतजार करो। उस दिन सोन नदी के किनारे शाम का लाल आसमान देख रहा था तो याद आया कि जिस तरह से हमारे गाँव के लड़के बिना कोचिंग के खेल सीख जाते हैं, उसी तरह गोआ के अकादमी वाले बच्चे बिना बड़े-बड़े सिद्धांतों के दम पर मैदान में जादू करते हैं। जो लोग कहते हैं कि पॉज़ेशन फुटबॉल अब पुरानी हो गई, उनसे मेरा सवाल है—भइया, क्या तुमने कभी देखा है कि जब गाड़ी का इंजन ठीक से चलता है तो कितना कम धुआँ निकलता है
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