अरे भाई, मैं अपनी दुकान पे एक पुराना कमॉडोर एम्प लगा रहा था, तभी एक बच्चा अपने बाप के साथ आया, हाथ में फटा स्क्वायर नेक गिटार लिए, डिमापुर से। पूछा तो बोला "सर, धीमा सुर चाहिए, नगाड़ा जैसा"। उसकी उंगलियों में चाय की दुकान के झुमका गीत की लय बसी थी, लेकिन पोजीशन पक्की थी। ये ईशान का असली खजाना है — यहाँ के बच्चों में वो मिट्टी का संगीत है जो कोचिंग में नहीं मिलता, बस मंच चाहिए और थोड़ा भरोसा।
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