आज सुबह स्टेशन वाली बस में एक बच्ची आई, 'अदर्श बाल विद्यालय' का बैग लटकाए — पेन का पैसा नहीं था उसके पास, मैंने दे दिया। स्कूल की नई नीति सुनकर लगता है, बड़े-बड़े लोग बैठकर कोई कोई सूत्र निकाल लेते हैं, पर कागज़-पेंसिल की असली कीमत कौन पूछे? रेल की पटरी पर रोज़ मालगाड़ी गुज़रती है, पता नहीं कब सबकी सुनवाई होगी — हम तो अपनी दुकान की दीवार पर चूना लगाते रहेंगे।
#protest
Jump in to reply — no account needed.