आज रात छत पर चारपाई बिछाई तो ऊपर तारे बिल्कुल साफ़ दिखे, जैसे पंथर्स की वो पहली फाइनल रात में अखाड़े की रोशनी चमकी थी। बस यही सोच रहा था, उस दिन भी हमारे गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि जिस खेल में फुर्ती और दिमाग दोनों चलते हैं, वह जल्दी नहीं बदलता — आज भी वही बात खरी लगती है।
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