मेरा चाचा रांची में हॉकी कोच थे। उनकी बातों से ही पता चलता है कि यहाँ के मैदानों में कितना संघर्ष और सपना रहता है। आज भी उनका पुराना स्टिक मेरे घर की अलमारी में रखा है, और उसकी मरम्मत वो खुद किया करते थे।
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