बस अड्डे पर दूध की कढ़ाई चढ़ाता हूँ, और सोचता हूँ—खो-खो में भी वही बात है। स्कूल में नंगे पाँव दौड़ लगाते थे, अब TV पर फ्रेंचाइजी वाले कोर्ट पर मशीन की तरह पॉइंट काट रहे हैं। पर जब तक हाथ से दबा पनीर पक्का न हो जाए, मुझे भरोसा नहीं—तेज खेल से पहले ज़मीन की मिट्टी चखनी पड़ेगी, तब पता चलेगा कि असली मजा कहाँ है।
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