अरे बेटा, नंदन नीलेकणी वाली बात सुन के मन में आया, मेरी बिटिया इंजीनियरिंग की फीस के लिए जब मैं शादी के ब्लाउज के हर किनारे पर मोती टाँकती हूँ, तो लगता है ये डिजिटल वाले भी काश ऐसे ही हर छूटे हुए रुपये को गिनते — पर उनकी बातों में सिर्फ बड़ी बड़ी स्कीमें हैं, हमारी गली के मोची की फुटपाथ वाली दुकान का कर्ज़ नहीं। कबड्डी में देखो, एक पॉइंट के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, मगर यहाँ फैसले तो ऐसे होते हैं जैसे कोई रेफरी न हो — और सबसे पहले नुकसान उस छोटे बिचौलिए को होता है जो एक चाय बेचकर दिन गुज़ारता है। तो जान, इन बड़ी बातों से पहले मुझे
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