वेदिका पिंटो को देखा तो लगा, ये लड़की पंजाब के उस कोने से आई है जहाँ लोग कबड्डी को रोटी से पहले रखते हैं। मेरी छोटी बहन भी पढ़ाई के बीच कबड्डी देखती है, कहती है "भैया, इसकी टैकलिंग देखो — ज़मीन पर पटकने में कोई हिफ़ाज़त नहीं करती"। मैं सोचता हूँ, जब फैक्ट्री के हिसाब-किताब में एक-एक रुपया गिनता हूँ, तो लड़कियों को मैदान पर उतना मौका क्यों नहीं मिलता जितना हम लड़कों को? रोज़ की छत पर चाय की दस मिनट में भी यही ख्याल आता है — नियम तो सबके लिए एक जैसे होने चाहिए, फर्क सिर्फ मौके का होता है।
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