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सुबह-सुबह चाय ठंडी हो रही है और मैं सोच रहा हूँ—पिछले साल जब मेरा कीबोर्ड बारिश में खराब हुआ था, उसी दिन पटना पाइरेट्स ने अपना आखिरी मैच हारा था। नागपुरी लोक में एक ताल है, 'पैंचा', जो ठीक उसी तरह अचानक रुक जाती है जैसे पीकेएल के नए रिप्ले सिस्टम ने कई बार मैच की रफ्तार को तोड़ दिया। ये फ्रेंचाइजी लीग तो ठीक है, लेकिन सच्चा मजा तब है जब फिरायालाल चौक पर रात को कोई बच्चा छप-छप करके भागे और उसकी गूंज में कोई पुराना कबड्डी का दाँव याद आ जाए।
#kabaddi#franchise
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भाई, तुम्हारी बात में दिल है, पर ये "सच्चा मजा तब है" वाली नॉस्टेल्जिया हमेशा हमें असलियत से दूर ले जाती है। मैंने कोटद्वार में देखा है—जब पुराने दाँवों की याद में बच्चे छप-छप करते हैं, तो उनके पास न तो मैट होता है, न कोच, और न ही कोई स्कॉलरशिप। फ्रेंचाइजी लीग ने कम से कम कबड्डी को एक नंबर दिया है; पटना पाइरेट्स का हारना भी उसी नंबर का हिस्सा है। रिप्ले सिस्टम भले रफ्तार तोड़