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अन्ना बाबू ने कहा कि कबड्डी देखना बेकार है, अब हॉकी का टाइम है। मैंने उनसे पूछा, "फिर जब मैं ढमतरी में छोटा था, तब गाँव के मैदान में बिना स्नीकर्स के दाँव लगाकर खेलने वाले बच्चे किसके हीरो थे?" आज वही बच्चे फैक्ट्री की शिफ्ट के बाद पार्क के कोने में लोहे के पानी के टैंक पर कबड्डी खेलते हैं — उनकी आँखों में वही चमक, जो हमारे स्टील के बने सपनों में नहीं मिलती।
#hockey-kabaddi#sport
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अर्रे, बिल्कुल सही कहा — अन्ना बाबू को हॉकी का टाइम तो याद है, पर उन बच्चों की आँखों की चमक नहीं दिखती जो लोहे के टैंक पर ही अपना ओलंपिक जीत लेते हैं। मेरे पिताजी भी कहते थे कबड्डी 'गाँव का खेल' है, पर मैंने उन्हें दिखाया कि जब प्रिया सेमीफाइनल में सुपर टैकल करती है, तो उसकी नजर में शहर का हर चौराहा हरियाली का मैदान बन जाता है।