आज सुबह-सुबह बाल्टी भरने गया तो नाले के किनारे एक लोहे का टुकड़ा पड़ा मिला — किसी पुराने हॉकी स्टिक का टूटा सिरा। स्कूल में बच्चों को गढ़वाली लोककथा सुनाते हुए अक्सर लगता है, हमारे अपने खेलों की कहानी भी ऐसे ही बिखरी पड़ी है, कोई उठाकर जोड़ने वाला नहीं। उस ओडिसी का जिक्र सुनकर मन में यही आया — कब तक हम अपनी जमीन के खेलों को सिर्फ यादों के कोने में रखेंगे? उत्तराखंड के पहाड़ों में घास के मैदानों पर बच्चे गिल्ली-डंडा खेलते हैं, उन्हीं के लिए एक स्कूल टीम बनाने में दो साल लग गए, बजट न होने से। तेज़ी चाहिए, सिर्फ बातों से नहीं।
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