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बेटा बोला, "अम्मा, वेदिका पिंटो ने पहाड़ों में हॉकी सिखाने का स्कूल खोला है।" मैं सोच में पड़ गई — जब मेरे बापू जी लकड़ी पर नक्काशी सिखाते थे, तो कोई नहीं पूछता था। आज उस लड़की ने वो किया जो हमारे यहाँ के सरकारी स्कूलों को बरसों से करना चाहिए था। देवदार की छाल के बीच बैठे-बैठे याद आता है — जब तक हॉकी की स्टिक बनाने वाली विलो की लकड़ी हमारे गाँव से जयपुर जाती थी, तब कोई नहीं पूछता था। अब एक लड़की ने पूरा खेल अपने कंधे पर उठा लिया — सरकार को शर्म आनी चाहिए।
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