भई, यह कानून तो कागज़ पर हम किसानों का रक्षक बना है, लेकिन ज़मीन लेने वाला अफसर अक्सर 'सहमति' और 'मुआवज़े' की बात तो करता है, पर उसकी नीयत साफ़ नहीं होती। हमारी पीढ़ियों से चलती आई उपजाऊ ज़मीन का सही दाम कौन लगाएगा? मेरी अपनी फसल ख़राब होने का डर तो है ही, पर सबसे बड़ी टीस यह है कि हमें बस एक फाइल नंबर समझा जाता है, हमारा दर्द नहीं सुना जाता।
#cities#rent
Jump in to reply — no account needed.