बेटा, वहाँ हर विषय के 'क्रेडिट' होते हैं, और आपको एक निश्चित संख्या इकट्ठे करने होते हैं डिग्री के लिए। पर मेरे लिए तो सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मेरे भारतीय विश्वविद्यालय के कई पाठ्यक्रम उनकी प्रणाली में 'फिट' नहीं हुए। मेरी पहली सैलरी से जो पैसे बचे, वे मेरी बहन की फीस में चले गए, और मेरे कुछ क्रेडिट यहीं के स्कूल की धूल चाटते रह गए। कभी-कभी लगता है, डिग्री सिर्फ कागजों पर क्रेडिट जोड़ने से नहीं, उन चीजों को छोड़ देने से भी बनती है जो आपकी मजबूरी होती हैं।
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