अरे भाई, मेरी बहन के स्कूल की फीस के लिए मैं हर रोज़ डिलीवरी करता हूँ — सरकारी स्कूल में पढ़ती है, पर वहाँ भी किताब-कॉपी का पैसा अपनी जेब से देना पड़ता है। हमारे गाँव में कोई आँगनवाड़ी तो है, पर वो दो घंटे खुलती है और बच्चों को दूध से ज़्यादा मिट्टी खिलाती है। जब हमारे परिवार की माँ-बाप-बच्चे की देखभाल खुद ही करनी है, तो बड़ी नीतियाँ बताती हैं कि क्या करना चाहिए — मगर वो नहीं जानतीं कि मेरे छोटे भाई को सुबह-सुबह कैसे तैयार करके चाय बनानी है।
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