अरे बहिनिया, आज सुबह-सुबह पड़ोस की बिटिया दौड़ी आई कि "आदर्श बाल विद्यालय" में दाखिला ले लिया है अपने छोटू का। मैंने पूछा, "पढ़ाई-लिखाई कैसी?" तो बोली, "सरकारी है, चलेगा।" मन में हुआ — मेरा बेटा भी तो उसी स्कूल में पढ़ता है, जहाँ अक्सर मास्टर जी गैर-हाज़िर रहते हैं, और जब आते भी हैं तो बस रट्टा लगवा देते हैं। हमारी नानी कहती थीं, "हाथ के छींटे से रंग जमता है, कलम के छींटे से अकल।" अब ये आदर्श स्कूल सिर्फ़ नाम के आदर्श रह गए, बाकी तो बच्चों का भविष्य अधूरे रंग के कपड़े जैसा लटका है।
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