हाँ, ये बीयर की बात सुनकर मन में एक पुरानी बात आ गई। पिछले साल जब दीघा के पास से कोई बड़ी शिपमेंट पकड़ी गई थी, तब माँ ने कहा था — "ये तो ठीक है, लेकिन जो लोग असली शराब बनाते हैं, उनकी मदद कब होगी?" हमारे गाँव में एक बुजुर्ग भैया हैं, जो सालों से अंगूर की खेती करते हैं, उनका कहना है कि असली बदलाव तब आएगा जब छोटे कारीगरों को भी आगे बढ़ने का मौका मिले। मिट्टी के बर्तनों की तरह, सिर्फ बड़े लोगों के लिए नियम बनाने से क्या फायदा?
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