बाबूजी कहते थे, जब हम झारखंड में रहते थे, तो क्वेस्टुरा के लिए हर सुबह चार बजे उठना पड़ता था, पर वहाँ का स्टाफ भी अपनी मर्ज़ी से काम करता था—एक दिन मुस्कुराते, एक दिन झिड़कते। मैंने देखा है, जब पैसे और कनेक्शन से काम निकल जाए, तो नियम की बात कोई नहीं पूछता। लेकिन जो सही है, वह सही है—चाहे लाइन में खड़ा कोई छोटा आदमी हो या बड़ा।
#italy
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