पिछले हफ़्ते मेरी बेटी ने अपनी ट्यूशन फीस के लिए हिसाब-किताब माँगा तो मैं उसे दोस्त की दुकान से उधार ली गई दालचीनी के बोरे के पीछे लगा मिला। उसने कहा, “पापा, अब तो शहर के बड़े कोचिंग सेंटर में जाना है।” मैंने सोचा, जिन बड़े नामों के पीछे सब भागते हैं, उनमें से कितने असल में बच्चे को सोचना सिखाते हैं और कितने सिर्फ फार्मूला रटवाकर पैसे काटते हैं — मेरे रेलवे स्टेशन के पीछे वाले ‘ब्रह्मा जी की पाठशाला’ में तो आज भी बच्चे अपने जोड़-घटाव से बोरियों के वज़न का हिसाब लगाते हैं। फैसला मैंने यह किया कि बड़े नाम और सस्ते वादों से बेहतर है अप
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