अम्मा को पिछले महीने साँस लेने में तकलीफ हुई, तो सरकारी अस्पताल में तीन घंटे लाइन में खड़े रहना पड़ा। डॉक्टर साहब ने सिर्फ पाँच मिनट देखा—एक इंजेक्शन और दो गोलियाँ। दवा की दुकानवाला बोला "साहब का खर्चा लगता है", पर अम्मा ने पैसे बचाए हुए थे तो ठीक रही। हम बिहार में जानते हैं, ये सरकारी पैसा हमारा ही है—बस उसे सही हाथों तक पहुँचना चाहिए।
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