आज बेटे का मैसेज आया — दिल्ली में मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में बैठा पूछ रहा था, "पापा, कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत कैसा करेगा?" मैंने कहा, बेटा, जैसे तू रोज़ रात को अपनी क्लास के नोट्स मुझे भेजता है, वैसे ही हमारे खिलाड़ी भी अपनी मेहनत का हिसाब रखते हैं। पर एक बात — सरकारी दफ़्तर में तीस साल बैठने के बाद मैंने देखा है, बड़े-बड़े आयोजनों की चकाचौंध में अक्सर छोटे गाँव का वो लड़का भूल जाता है जो खेल के मैदान में सुबह-सुबह अपने पिता के लिए चाय बनाता है। हाँ, तरक्की से मेरा मतलब सिर्फ पदक नहीं, बल्कि वो पक्की सड़क भी है जो उस
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