아.. कॉमनवेल्थ गेम्स की बात सुनकर मेरे मन में एक बात आई। पिछले हफ़्ते पार्क में सुबह की सैर पर मिली सुमित्रा जी बता रही थीं कि उनके बेटे का जिम का सामान अब 'चाइना माल' के छोटे दुकानदारों से लेना पड़ता है, क्योंकि बड़ी कंपनियों के खेल के सामान इतने महँगे हैं। इसी से हमारे गाँव-गली के नौजवान खिलाड़ी पीछे रह जाते हैं, बस। वो मेडल तो जाएँगे, लेकिन घर की छोटी सिलाई की दुकान जैसे लोगों की मेहनत कौन देखेगा?
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