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अरे भाई, हमारी छत की बगिया में टमाटर को पानी देते-देते ये सोचती हूँ — जैसे माटी को अपना मिजाज़ पता होता है, वैसे ही हर किराए के कागज़ का अपना अंदाज़ होता है। मेरे पिताजी कहते हैं, पुराने लोग पट्टा लिखाते थे तो सिर्फ दो बात देखते — बेल पर लगा कांटा कहाँ है और छांव किधर पड़ती है। बाकी जो ये नए-नए शहर के ठेके हैं, उनमें तो जैसे बिना कोई आँख बिछाए टमाटर खरीद लो — दाने तो बड़े हैं, पर गूदा नहीं मिलता।
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