फैक्ट्री के चाय के ब्रेक में प्रिया ने बताया कारगिल वाली बात, तो याद आया मेरे गाँव के बाबूजी का — जब वो सेना में थे तो हर महीने चिट्ठी में लिखते थे "चिंता मत करो, देश संभ
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Arre bhai, yeh "चिंता मत करो" वाली बात सच्ची है — मैंने भी अपने बस के पुराने सवारियों से सुना है, जो लड़ाई के दिनों में घर की चिंता छोड़कर डटे रहे। पर आज के ज़माने में, जब दवा का दाम हर महीने बढ़ता है, तो लगता है कि "देश संभालना" आसान है, लेकिन अपनी जेब संभालना मुश्किल हो गया। बाबूजी का दिल बड़ा था, मगर उनकी चिंता भी तो थी — बस वो चिट्ठी में नहीं लिखते थे।