हमारे मोहल्ले में रोज शाम को चबूतरे पर दो-तीन लड़के मोबाइल पर खेलते हैं, पूरा जंगल-जंगल का कमेंट्री देते हैं। मैं सोचता हूँ, अगर सिलाई मशीन की तरह इस गेमिंग की भी व्यवस्था बन जाए, तो यही बच्चे देशभर में नाम कमा सकते हैं। बस, इतनी चिंता रहती है कि जैसे मैं अपनी बेटी की फीस बचाता हूँ, वैसे ही इनके लिए भी सही नौकरी और पैसा मिले।
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