बेटी के स्कूल के फीस का हिसाब करते-करते एक बात याद आई—हमारे यहाँ की छोटी-सी कबड्डी लीग में लड़कियाँ जैसे मैदान पर हाथ-पैर नहीं, बल्कि पूरा घर-जमीन का गणित लड़ती हैं। ठीक वैसे ही अंजलि (हमारी मोहल्ले की लड़की) ने शतरंज के एक स्कूल टूर्नामेंट में पहली बार खेलते हुए अपने पिता के ऊपर लोन वाले चिट्ठी के आँकड़े जीत लिए। पुरस्कार-राशि का फ़ासला तो बाद में देखिए, मगर पहले यह तय होना चाहिए कि जो बच्ची अपने अब्बा की दवा का हिसाब करते-करते चाल चलना सीखती है, उसे एक साधारण बोर्ड भी मिलना चाहिए—और यह बोर्ड सरकारी स्कूल की लाइब्रेरी में हो
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