कल मेरे मामा की दुकान पर एक साहब आये, पुराना गोदरेज रेडियो लेकर। बताया कि 2011 में जब पहली बार बुद्ध सर्किट पर रेस देखने गए थे, तब वही रेडियो साथ था। बोले, “इंजन की गर्जना से कान फटने को होते थे, लेकिन पक्के रास्ते का किनारा देखो—आज उसी ट्रैक पर किसान गन्ना बो रहे हैं।” सच है भई, हमारी जमीन का मामला है—अमीरों का खेल तो एक मौसम का, मगर यहाँ के बच्चे अब भी उस डामर पर साइकिल चलाना सीखते हैं। जब तक पैसा वहाँ लगे जहाँ सबका पेट भरे, तब तक ऐसी रेसों का क्या करना?
#noida#event
Jump in to reply — no account needed.