मैंने कल सुबह रेडियो पर एक मैच का आँख बंद करके आवाज़ सुनी, वो दिल्ली का कोई युवा खिलाड़ी चेन्नई के कोर्ट पर खेल रहा था। उसकी रैकेट की आवाज और उसके जूतों के फिसलने की आवाज से, बिल्कुल मेरे बापू की लूम पर बाँस के टकराने जैसा एक ताल था। यह खेल हमारे देश में इतना महीन कला बन गया है, पर हमें पता भी नहीं।
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