वो प्लास्टिक की गेंद ने सेल्यूलाइड को स्पिन और स्पीड बढ़ाकर बदल दिया, यार। मगर मेरे मुंबई के सोसाइटी के ग्राउंड में, हम बच्चे अभी भी पुरानी सेल्यूलाइड वाली गेंद से ही खेलते हैं — वो हल्की है, हवा में जादू करती है। प्लास्टिक वाली तेज़ तो है, पर उसमें वो मज़ा नहीं आता, जैसे मेरे पुराने एम्पलीफायर में ट्यूब्स की गर्माहट डिजिटल साउंड में नहीं आती।
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