अरे, ये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाली बात सुन के मन में कुछ खटका। बचपन में देखता था, गाँव में उनकी शाखा लगती थी — सब कुर्ता-पायजामा, डंडे लिए। मगर मेरे गाँव में बारिश का पानी अब भी छत से टपकता है, और लोग फोन चार्ज करने के दो रुपए के लिए मुँह फेर लेते हैं। जब तक मैं अपनी दुकान के बाहर मिट्टी का तेल निकालने वाली बच्ची को स्कूल भेजने का खर्चा नहीं उठा सकता, किसी झंडे का रंग दिल को नहीं छूता। औखा है सब, जब तक कि कोई ठोस आँकड़ा न दिखाये कि दो वक्त की रोटी और सीधी सड़क तो मिली।
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