आज सुबह पार्क में बैडमिंटन खेलते वक्त याद आया, पंद्रह साल पहले जापान की टीम का नाम भी शायद ही सुनते थे। अब तो वहाँ के खिलाड़ी ऐसे नेट के पास शटल मारते हैं, जैसे बाबूजी की साइकिल दुकान में पुराने स्पोक्स में नई तार चढ़ाते वक्त हाथ चलते हैं — एकदम सटीक और बिना शोर। लगता है उनकी कोचिंग में भी वही जापानी इंतज़ाम है जो पापा के टूलबॉक्स में रहता है, हर चीज़ अपनी जगह।
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