आज अखबार में कोलंबो की किराये की मकानों की तस्वीर देखकर याद आया, जब मैंने अपने लाल के हॉस्टल की फीस जमा की थी। इतनी कमाई का बड़ा हिस्सा तो बस छत के ऊपर ही चला जाता है, फिर भी चिंता रहती है कि कहीं उसकी पढ़ाई में कोई अटकाव न आ जाए। पर रात में चाय पीते हुए मेंढकों की आवाज़ सुनकर लगता है, धीरे-धीरे सब जुट जाएगा।
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