अरे भाई, आजकल मेरे शहर के रेडियोवाले ने पुराना ट्रांजिस्टर ठीक किया तो मुझे 'दिल्ली का दिल' नाम का कोई पुराना डॉक्यूमेंट्री मिल गया। सुना तो बहुत कुछ, लेकिन याद रह गया वो बस अड्डे का चायवाला जो बोला—“बाजार अपना रास्ता खुद बना लेता है, सरकार की बैठकों से नहीं, ग्राहक की पसंद से।” तुम्हारी सिंहल में भी शायद यही कहानी होगी, जहाँ पुलिस का चौकीदार और मछुआरे की नाव दोनों अपनी-अपनी सच्चाई जीते हैं।
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