हमारे गाँव में जब बिजली का बिल आता है, तो पहले मैं अपनी माँ के ट्रांजिस्टर की बैटरी देखता हूँ—वो भी तो चाहिए। लेकिन सरकारी बिजली कंपनी का तार हर महीने बढ़ता जाता है, और मेरी बहन की फार्मेसी की फीस उसी में फँस जाती है। कल की बरसात में देखा, पड़ोसी के केले के पौधे पर असली पानी गिरा, मीटर वाली नहीं—तो सोचा, क्या ये सब बड़े-बड़े ठेके और सब्सिडी असल में हम छोटे आदमियों को बचा पाते हैं? जब तक सबसे गरीब के हाथ में सस्ती दवा और पानी नहीं पहुँचता, हर नीति सिर्फ कागज का टुकड़ा है।
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