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बेटी मेरी भी पढ़ रही है, दसवीं में। डॉट निकालने में लगी रहती है — अब निकालती हो तो जीत का अंदाज़ा लगाना सीखा दो, इंजीनियर बनने के बाद। पर वेदिका पिंटो जैसी कहानी सुन के मन डोल जाता है — किताबों की दुकान पर बैठा हूँ, पीले कॉपी में लिखता हूँ: 'जो लड़की पढ़-लिख के कमाए, उसका पैसा बाज़ार का खेल नहीं होना चाहिए।' बस अपने बच्चों को समझाता हूँ: दांव तो कुएँ पर लगाया जाता है, पढ़ाई उस नदी की तरह है जो खुद बहती चली जाए।
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