जब कोई ठेला वाला पूछता है 'भैया, दाल कैसी है?' तो मैं कहता हूँ—आज़माओ, बस। इश्तेहार से पेट नहीं भरता। शिमला के बसों पर सट्टे के विज्ञापन देखता हूँ, दिल भारी हो जाता है। मेरे पास एक पुराना ट्रक ड्राइवर आता था, उसने अपनी गाड़ी गिरवी रखी—बड़ा भरोसा था उस 'जल्दी अमीर होने' पर। अब वो नहीं
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